21वीं सदी का तेरहवाँ वर्ष भी गुजर गया। आज तक २१ वी सदी के विकास की परिभाषा भी हम गढ़ नहीं पाए। औपनिवेशिक काल से चली आ रही विकास के प्रारूप से ही इस सदी के विकास का निर्धारण कर रहें हैं। जिसके कारण प्राकृतिक संसाधनों एवं मानव- श्रम का अंधाधुंध शोषण इस व्यवस्था में जारी है ।
आँधियो के गावों में माटी के दीपक जलाकर देखिए। इस जमाने में उसूलो को जरा निभाकर देखिए। . दिशाओं की चट्टानें बरस पड़ेगी तुम्हारे सर पर। हकबयानी को जरा फितरत बनाकर देखिये। उनकी आँखों में तुम सुईयों सा चुभने लगोगे। अपनी आँखों में एक -दो सपने सजाकर देखिए। . महलों ने प्रकाश चुराकर दिया है दर्द का अँधेरा। अंधेरी कुटिया में रौशनी के झरने बहाकर देखिए वक्त के आइने पर कोहरे का पर्त उग आया है। क्षितिज के धुंध में नया सूरज लाकर देखिए। प्रमोद श्रीवास्तव
ब्रिटेन में प्रत्याशियों का चयन करनेवाले राजनीतिक दल ने महिला प्रत्याशी को यह सुझाव दिया कि वे राजनीति में न आकर घर में अपने बाल -बच्चों का देखभाल करें अच्छा होगा। वह महिला अपने दल के सुझाव की अनदेखी कर चुनाव में कूद पड़ी। वह विजयी बनी ,अपने देश की प्रधान मंत्री भी। राजनीति में आकर अपने देश के हित में अनेक साहसपूर्ण निर्णय लिए। वह महिला थी ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर। अरविन्द केजरीवाल भी अन्ना हजारे के सुझाव की अनदेखी कर राजनीति में आकर दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने वाले है। देखना यह है कि क्या वे जनता से किये गए वादों को निभा पायेंगे। क्या वे भी राजनीति में आकर अपने साहस पूर्ण निर्णय से राजनीति को नई दिशा दे पाते है। प्रमोद श्रीवास्तव ,अम्बिकापुर ,छत्तीसगढ़
ब्रिटेन में प्रत्याशियों का चयन करनेवाले राजनीतिक दल ने महिला प्रत्याशी को यह सुझाव दिया कि वे राजनीति में न आकर घर में अपने बाल -बच्चों का देखभाल करें अच्छा होगा। वह महिला अपने दल के सुझाव की अनदेखी कर चुनाव में कूद पड़ी। वह विजयी बनी ,अपने देश की प्रधान मंत्री भी। राजनीति में आकर अपने देश के हित में अनेक साहसपूर्ण निर्णय लिए। वह महिला थी ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर। अरविन्द केजरीवाल भी अन्ना हजारे के सुझाव की अनदेखी कर राजनीति में आकर दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने वाले है। देखना यह है कि क्या वे जनता से किये गए वादों को निभा पायेंगे। क्या वे भी राजनीति में आकर अपने साहस पूर्ण निर्णय से राजनीति को नई दिशा दे पाते है। प्रमोद श्रीवास्तव ,अम्बिकापुर ,छत्तीसगढ़
Sarguja-At a glance,part 03
भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में बिखरे पुरातात्विक सामग्रियों का अध्ययन आवश्यक है. सरकारी उपेक्षा के कारण अधिकांश प्राचीन मूर्तियाँ नष्ट हो गई है,कुछ चोरी हो गई है।सरगुजा का डीपाडीह गाँव जो प्राचीन मूर्तियों का गांव है ,जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। फ़िलहाल आपके लिए कुछ छायांकन प्रस्तुत है। अंबिकापुर से १५ किमी दूर लखनपुर से होते हुवे महेशपुर गांव की धरोहर।
http://www.mitra-mandal.blogspot/com
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MIning accident
सन १९०१ से लेकर आज तक की खान दुर्घटनाओं के विश्लेषण से हम यह पाते हैं कि खान -दुर्घटनायें मानवीय असावधानी के कारण घटित होती हैं। खदानों में खान दुर्घटनाएं मुख्य रूप से खदान के अन्दर पानी निकल आने एवं आग /कोयले की धूल भडकने से तथा छत गिरने से हुई है। भारत में खदान की सबसे बड़ी दुर्घटना दि २७-१२-१९७५ को चासनाला खदान में पानी निकल आने से हुई थी ,जिसमे ३७५ व्यक्तियो को अपनी जान गवानी पड़ी। दूसरी बड़ी खान दुर्घटना दि २८-०१-१९६५ को धोरी खदान में कोयले की धूल के विस्फोट से हुई थी ,जिसमे २६८ व्यक्तियों को अपनी जान गवानी पड़ी। तीसरी बड़ी दुर्घटना दि १८-१२-१९३६ में पोईडीह खदान में आग/कोयले की धूल भड़कने से हुई थी जिसमे २०९ व्यक्ति काल के गाल में समां गए।
KITANA ACHCHHA HOTA
वर्षों बेकारी के आलम में
भटकने के बाद -
उसे तीन सौ रुपये की मास्टरी मिली।
इधर दो -दो बेटियाँ जवान
होती जा रहीं हैं।
वह सोचता है ,बेटी के बारे में
बेटी बड़ी हो रही है
और वह दरक रहा है।
इधर बच्चों को पढ़ाता है -
दहेज़ बुरी चीज है
और उधर खुद दहेज़ के बिना
कोई लड़का उसे अपनी बेटी के
शादी के लिए नहीं मिल रहा है।
उसके पाँव के जूते चरमरा रहे है ,
और वह परेशां बड़बड़ा रहा है
कितना अच्छा होता -
यदि वह लड़की का बाप न होता।
लड़की को देखता हूँ -
रोज उस मंदिर में ,
पत्थर के सामने गिड़गिड़ाती है
उसके बाप को उसके लिए
कोई वर मिल जाए
पर पत्थर तो पत्थर ही होता है
वह लड़की प्रतिक्षा करती है -
पत्थर के पिघलने की।
शायद वह सोचती है
पत्थर से कोई इन्सान जैसा
भगवान निकलेगा।
वह उसके सर पर हाथरख कर
एवमस्तु ! कहकर अंतर्ध्यान हो जायेगा
और उसे घर आने पर -
अपनी मनोकामना पूरी होते हुए दिखेगी
पर वर्षों प्रतीक्षा के बाद भी
कोई भगवान नहीं आया।
पत्थर के फेर में हमने कितने युग
बरबाद किये
अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख दिए
यवन , तुरक के हाथों में।
हमें वे लुटते गए
और हम -
पत्थरो के आगे झुकते गए।
कितना अच्छा होता
यदि इस कुँवारी लड़की को मालूम होता
कि ये पत्थर अनंतकाल तक
मौन ही रह जाएँगे।
सिर्फ एक जुटता ,अन्तर्विरोधों की
समझदारी की भाषा ही
हमें कुछ दे सकती है।
संवेदना शून्य विचारों की धरातल पर
खड़े हुए इस समाज को
ठुकराने के लिए
हमे एकजुट होना पड़ेगा।
कितना अच्छा होता
यदि यह मालूम हो जाये
हर कुँवारी लड़की ,कुँवारे लड़के व उसके बाप को।
(लगभग ३२ वर्ष पूर्व प्रकाशित स्वरचित कविता )
भटकने के बाद -
उसे तीन सौ रुपये की मास्टरी मिली।
इधर दो -दो बेटियाँ जवान
होती जा रहीं हैं।
वह सोचता है ,बेटी के बारे में
बेटी बड़ी हो रही है
और वह दरक रहा है।
इधर बच्चों को पढ़ाता है -
दहेज़ बुरी चीज है
और उधर खुद दहेज़ के बिना
कोई लड़का उसे अपनी बेटी के
शादी के लिए नहीं मिल रहा है।
उसके पाँव के जूते चरमरा रहे है ,
और वह परेशां बड़बड़ा रहा है
कितना अच्छा होता -
यदि वह लड़की का बाप न होता।
लड़की को देखता हूँ -
रोज उस मंदिर में ,
पत्थर के सामने गिड़गिड़ाती है
उसके बाप को उसके लिए
कोई वर मिल जाए
पर पत्थर तो पत्थर ही होता है
वह लड़की प्रतिक्षा करती है -
पत्थर के पिघलने की।
शायद वह सोचती है
पत्थर से कोई इन्सान जैसा
भगवान निकलेगा।
वह उसके सर पर हाथरख कर
एवमस्तु ! कहकर अंतर्ध्यान हो जायेगा
और उसे घर आने पर -
अपनी मनोकामना पूरी होते हुए दिखेगी
पर वर्षों प्रतीक्षा के बाद भी
कोई भगवान नहीं आया।
पत्थर के फेर में हमने कितने युग
बरबाद किये
अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख दिए
यवन , तुरक के हाथों में।
हमें वे लुटते गए
और हम -
पत्थरो के आगे झुकते गए।
कितना अच्छा होता
यदि इस कुँवारी लड़की को मालूम होता
कि ये पत्थर अनंतकाल तक
मौन ही रह जाएँगे।
सिर्फ एक जुटता ,अन्तर्विरोधों की
समझदारी की भाषा ही
हमें कुछ दे सकती है।
संवेदना शून्य विचारों की धरातल पर
खड़े हुए इस समाज को
ठुकराने के लिए
हमे एकजुट होना पड़ेगा।
कितना अच्छा होता
यदि यह मालूम हो जाये
हर कुँवारी लड़की ,कुँवारे लड़के व उसके बाप को।
(लगभग ३२ वर्ष पूर्व प्रकाशित स्वरचित कविता )
aastha ka sooraj
मुठ्ठी भर -
आकाश पाने के लिए ,
उम्रभर इन्द्रधनुष रचता रहा।
मगर ,आस्था की मोड़ पर फैले कुहरों ने
दृस्टियो के सूरज को निगल खाया।
इसलिए ,हर इंद्रधनुष अपनी रंगीनियों में
हमें ही बुनते रहे।
बहुत चाहा -
धूप की एक सुनहली किरण लेकर
अपनी सूनी देहरी पर -
प्रभात का सन्देश
स्वर्णाक्षरों में लिख दूँ।
परन्तु ,हर पग पर फैले
स्वार्थ ,ठग के काले बादलों ने
प्रभात किरणों को नोच डाला।
मैं जिंदगी भर तलाशता रहा
मुठ्ठी भर आकाश
आकाश में आस्था का एक सूरज।
(लगभग २९ वर्ष पूर्व किसी दैनिक में प्रकाशित स्वरचित कविता का एक अंश )
आकाश पाने के लिए ,
उम्रभर इन्द्रधनुष रचता रहा।
मगर ,आस्था की मोड़ पर फैले कुहरों ने
दृस्टियो के सूरज को निगल खाया।
इसलिए ,हर इंद्रधनुष अपनी रंगीनियों में
हमें ही बुनते रहे।
बहुत चाहा -
धूप की एक सुनहली किरण लेकर
अपनी सूनी देहरी पर -
प्रभात का सन्देश
स्वर्णाक्षरों में लिख दूँ।
परन्तु ,हर पग पर फैले
स्वार्थ ,ठग के काले बादलों ने
प्रभात किरणों को नोच डाला।
मैं जिंदगी भर तलाशता रहा
मुठ्ठी भर आकाश
आकाश में आस्था का एक सूरज।
(लगभग २९ वर्ष पूर्व किसी दैनिक में प्रकाशित स्वरचित कविता का एक अंश )
naye sooraj kee talash
मै अब ख़ामोश हूँ।
लेकिन मेरी खामोशी का मतलब नहीं
उन मुठीभर पूजीपतियों , राजनेताओं द्वारा
शब्दों के खरीदने के अधिकारों का समर्थन।
मैं जानता हूँ -
शब्दों में वह आग छिपी है ,
जो मशाल बनकर मुट्ठी भर नेताओं
के काले कारनामों को
खाक में मिला सकती है।
यह भी जानता हूँ -
यदि शब्दों में छिपी आग को
बाहर नहीं निकलते हैं तो
यह आग अपने को जला डालती है।
आज जबकि शब्द राजनेताओ
के हाथों में सिसकियाँ भर रहा है ,तो
शब्दों की व्यथाओं को
शब्दों में ही ,
रोशनाई से नहीं लिखा जा सकता है।
उनके द्वारा आज -
शब्दों की सच्चाई पर
बारूदी ढेर फैलाया जा रहा है।
अर्थहीन शब्दों का
अर्थ लगाया जा रहा है।
ऐसे में आज सही लफ्जों को भी
लकवा मार गया है।
आज सत्ता मूल्यवान शब्दों को खरीदकर ,
परमाणु विस्फ़ोट के कगार पर
दुनिया को खड़ा कर दिए हैं।
परन्तु कोई पूँजीपति /राजनेता /सत्ता
इन मूल्यवान शब्दों को खरीदकर
रोटी के विस्फोट पर
दुनिया को नहीं खड़ा करता है।
शब्दों को गलत हाथों में
बिकाहुआ देखकर
मेरे जिस्म का ख़ून खौल रहा है।
अन्तर्मन खुद मुझे कोस रहा है
लेकिन मेरी अपनी मजबूरियां हैं
इसलिए इस अंधेरे के ख़िलाफ़
ख़ामोश होकर -
एक नया सूरज गढ़ रहा हूँ।
(लगभग ३० वर्ष पूर्व प्रकाशित एवं आकाशवाणी अंबिकापुर से प्रसारित स्वरचित कविता )
लेकिन मेरी खामोशी का मतलब नहीं
उन मुठीभर पूजीपतियों , राजनेताओं द्वारा
शब्दों के खरीदने के अधिकारों का समर्थन।
मैं जानता हूँ -
शब्दों में वह आग छिपी है ,
जो मशाल बनकर मुट्ठी भर नेताओं
के काले कारनामों को
खाक में मिला सकती है।
यह भी जानता हूँ -
यदि शब्दों में छिपी आग को
बाहर नहीं निकलते हैं तो
यह आग अपने को जला डालती है।
आज जबकि शब्द राजनेताओ
के हाथों में सिसकियाँ भर रहा है ,तो
शब्दों की व्यथाओं को
शब्दों में ही ,
रोशनाई से नहीं लिखा जा सकता है।
उनके द्वारा आज -
शब्दों की सच्चाई पर
बारूदी ढेर फैलाया जा रहा है।
अर्थहीन शब्दों का
अर्थ लगाया जा रहा है।
ऐसे में आज सही लफ्जों को भी
लकवा मार गया है।
आज सत्ता मूल्यवान शब्दों को खरीदकर ,
परमाणु विस्फ़ोट के कगार पर
दुनिया को खड़ा कर दिए हैं।
परन्तु कोई पूँजीपति /राजनेता /सत्ता
इन मूल्यवान शब्दों को खरीदकर
रोटी के विस्फोट पर
दुनिया को नहीं खड़ा करता है।
शब्दों को गलत हाथों में
बिकाहुआ देखकर
मेरे जिस्म का ख़ून खौल रहा है।
अन्तर्मन खुद मुझे कोस रहा है
लेकिन मेरी अपनी मजबूरियां हैं
इसलिए इस अंधेरे के ख़िलाफ़
ख़ामोश होकर -
एक नया सूरज गढ़ रहा हूँ।
(लगभग ३० वर्ष पूर्व प्रकाशित एवं आकाशवाणी अंबिकापुर से प्रसारित स्वरचित कविता )
Baal-Sahitya
हिंदी में बाल -साहित्य का अभाव है। बाल -साहित्य के नाम पर हिंदी में यथार्थ धरातल से परे भूत -प्रेत ,परी ,पक्षी से सम्बंधित कथाएँ ही उपलब्ध थी। आज के युग में ये कथाएँ बच्चों की जिज्ञासा एवं उनके मानसिक विकास में सहायक नहीं है। हिंदी साहित्य में श्री हरिकृष्ण देवसरे ही एकमात्र ऐसे लेखक है ,जिन्होंने अपना पूरा जीवन बाल -साहित्य सृजन में खपा दिए। प्रिंट -मीडिया के अतिरिक्त रेडियो ,दूरदर्शन के लिए उनका लेखन बच्चों के लिए ही समर्पित था।
पराग के माध्यम से देवसरे जी ने बच्चों की जिज्ञासा एवं पढ़ने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया। बच्चों की पत्रिका पराग को बच्चों के साथ -साथ जवान एवं बूढें भी उसे चाव से पढ़ते थे।
बालको के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले देवसरे जी बाल दिवस पर ही हमसे जुदा हो गए।
प्रणाम एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
पराग के माध्यम से देवसरे जी ने बच्चों की जिज्ञासा एवं पढ़ने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया। बच्चों की पत्रिका पराग को बच्चों के साथ -साथ जवान एवं बूढें भी उसे चाव से पढ़ते थे।
बालको के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले देवसरे जी बाल दिवस पर ही हमसे जुदा हो गए।
प्रणाम एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
Mitra-Mandal
aaj internet par blogs kee bharmar hai. blogs ke madhyam se pratyek byakti apne vicharo ko vyakt kar raha hai. vichar hee nai awiskar kee janani hai. isliye mai pratyek byakti ke vicharo ka swagat karta hu. Mitra-mandal aise vicharo ko prastut karne ke liye aapke samne prastut hai,jo dalit,patit.samaj ke pichhade vargo ke prati apnee pratibadhta rakhta hai,unke pichhadepan ka karan aivam samadhan ke liye tatpar hai. pratyek patra-ptrikaye yah dava karte hai ki ve swatanta vicharo ke pakkchhdhar hai,jabki swatantra vichar ka astitwa hi nahi hota hai,na swatantra vichar ho sakte hai.--writer...pramod srivastav
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