Election Reforms :-भारत की निर्वाचन प्रणाली में अनेक खूबियों के साथ कुछ बुराईयाँ हैं ,इन बुराईयों को दूर करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा भारत सरकार को कई उपाय सुझाये गए हैं , इसके अतिरिक्त चुनाव सुधार के लिए - समय पर कई समिति गठित की गई ,जिसका विवरण निम्नानुसार है।
१ -तारकुंडे समिति रिपोर्ट १९७५
२-गोस्वामी समिति रिपोर्ट १९९०
३ -वोरा समिति रिपोर्ट १९९३
४-इंद्रजीत समिति रिपोर्ट १९९८
५ डी के जैन की अगुवाई में लॉ कमीशन की रिपोर्ट १९९९
६ -नेशनल कमीशन टू रिव्यु दि वर्किंग ऑफ़ दि कंस्टीटूयोंशन २००१
७ -भारत निर्वाचन आयोग २००४
८ -द्वितीय प्रशासनिकसुधार समिति की रिपोर्ट २००८
इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों ने चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए सरकार को बाध्य किया है। १९५० से १६ ओक्टूबर १९८९ तक एक सदस्यीय निकाय के रूप में भारत के चुनाव आयोग का कार्य रहा है। १६ अक्टूबर १९८९ से ०१ जनवरी १९९० (२ माह १५ दिन )तक तीन सदस्यीय रहा। ०१ जनवरी १९९० को फिर एक सदस्यीय बना दिया गया। किन्तु अक्टूबर १९९३ में केंद्रीय सरकार की सिफारिस पर राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया। दिसम्बर १९९३ में राष्ट्रपति के अध्यादेश को संसद ने पारित कर उसे कानूनी रूप दे दिया। टी एन शेषन द्वारा सरकार के इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय ने शेषन को संविधान के अनुसार अपनी मर्यादा में रहकर अन्य आयुक्तों के साथ मिलकर (सहयोग से )कार्य करने की हिदायत दी। भारतीय निर्वाचन प्रणाली में दागी (अपराधी )व्यक्तियों का चुनकर सांसद बनना तथा कार्पोरेट घरानों द्वारा चुनाव को प्रभावित कर अपने हित में अपने प्रतिनिधि के माध्यम से संसद का संचालन किया जाना एक गम्भीर समस्या है।
( शेष अगले अंक में )
१ -तारकुंडे समिति रिपोर्ट १९७५
२-गोस्वामी समिति रिपोर्ट १९९०
३ -वोरा समिति रिपोर्ट १९९३
४-इंद्रजीत समिति रिपोर्ट १९९८
५ डी के जैन की अगुवाई में लॉ कमीशन की रिपोर्ट १९९९
६ -नेशनल कमीशन टू रिव्यु दि वर्किंग ऑफ़ दि कंस्टीटूयोंशन २००१
७ -भारत निर्वाचन आयोग २००४
८ -द्वितीय प्रशासनिकसुधार समिति की रिपोर्ट २००८
इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों ने चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए सरकार को बाध्य किया है। १९५० से १६ ओक्टूबर १९८९ तक एक सदस्यीय निकाय के रूप में भारत के चुनाव आयोग का कार्य रहा है। १६ अक्टूबर १९८९ से ०१ जनवरी १९९० (२ माह १५ दिन )तक तीन सदस्यीय रहा। ०१ जनवरी १९९० को फिर एक सदस्यीय बना दिया गया। किन्तु अक्टूबर १९९३ में केंद्रीय सरकार की सिफारिस पर राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी करके निर्वाचन आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया। दिसम्बर १९९३ में राष्ट्रपति के अध्यादेश को संसद ने पारित कर उसे कानूनी रूप दे दिया। टी एन शेषन द्वारा सरकार के इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय ने शेषन को संविधान के अनुसार अपनी मर्यादा में रहकर अन्य आयुक्तों के साथ मिलकर (सहयोग से )कार्य करने की हिदायत दी। भारतीय निर्वाचन प्रणाली में दागी (अपराधी )व्यक्तियों का चुनकर सांसद बनना तथा कार्पोरेट घरानों द्वारा चुनाव को प्रभावित कर अपने हित में अपने प्रतिनिधि के माध्यम से संसद का संचालन किया जाना एक गम्भीर समस्या है।
( शेष अगले अंक में )
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